Fikr Aur Farz Ka Sangam / फिक्र और फ़र्ज़ का संगम (Poetry On Father's Day)

Fikr Aur Farz Ka Sangam / फिक्र और फ़र्ज़ का संगम (Poetry On Father's Day)    फिक्र और फर्ज का संगम है पिता   अपनी कुछ अद्भुत छवि बनाता है पिता    कभी डर तो कभी प्यार दिखाता है पिता   कहता कम लेकिन सुनता ज्यादा है पिता   बच्चों के हर पल का हिसाब रखता है पिता   अपने बच्चों से बेशुमार प्यार करता है पिता     फिक्र और फर्ज का संगम है पिता   अपनी कुछ अद्भुत छवि बनाता है पिता    बच्चों का हर ख्वाब जानता है पिता  हर हाल में उन्हे मुकम्मल करता है पिता   सच कहूँ तो खुदा का रूप होता है पिता   नही इसकी तुलना किसी से,  कुछ ऐसा होता है पिता    फिक्र और फर्ज का संगम है पिता   अपनी कुछ अद्भुत छवि बनाता है पिता    -दीपिका जैन


Fikr Aur Farz Ka Sangam / फिक्र और फ़र्ज़ का संगम (Poetry On Father's Day)


फिक्र और फर्ज का संगम है पिता 

अपनी कुछ अद्भुत छवि बनाता है पिता


कभी डर तो कभी प्यार दिखाता है पिता 

कहता कम लेकिन सुनता ज्यादा है पिता 

बच्चों के हर पल का हिसाब रखता है पिता 

अपने बच्चों से बेशुमार प्यार करता है पिता 


फिक्र और फर्ज का संगम है पिता 

अपनी कुछ अद्भुत छवि बनाता है पिता


बच्चों का हर ख्वाब जानता है पिता

हर हाल में उन्हे मुकम्मल करता है पिता 

सच कहूँ तो खुदा का रूप होता है पिता 

नही इसकी तुलना किसी से,  कुछ ऐसा होता है पिता


फिक्र और फर्ज का संगम है पिता 

अपनी कुछ अद्भुत छवि बनाता है पिता


-दीपिका जैन

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