Kuch Lamhe Khaas / कुछ लम्हे खास (Poetry On Life)

Kuch Lamhe Khaas / कुछ लम्हे खास (Poetry On Life)    ना ही कोई शोर था, ना ही आ रहीं थी आवाजें गुफ़्तगू की  छाया था एक दिल धहलाने वाला सन्नाटा, चहुँ ओर मेरे  सुनाई देती तो बस आहट कदमों की, भयावह था सफर ये  यूँ तो भीड़ थी बेशुमार, पर जैसे कोई नही था आस-पास   थी शीघ्रता सभी को मंजिल तक जाने की, अभी यकीनन  घड़ी थी ये परीक्षा की, उत्तीर्ण होना था जरूरी जिसमें   ये नतीजा ही तो करता तय आने वाली जिन्दगी की तस्वीर   बनाता भविष्य की खुशियों और गमों का लेखा-ज़ोखा  पल ये छात्र जीवन के आते हैं जब याद अधेड अवस्था में   बरबस ही आ जाती है मुस्कान, लेकिन मिलता है सुकून   निःसंदेह होता है गर्व कोशिशों पे अपनी, देख अपना वर्तमान     -दीपिका जैन



Kuch Lamhe Khaas / कुछ लम्हे खास (Poetry On Life) 


ना ही कोई शोर था, ना ही आ रहीं थी आवाजें गुफ़्तगू की

छाया था एक दिल धहलाने वाला सन्नाटा, चहुँ ओर मेरे

सुनाई देती तो बस आहट कदमों की, भयावह था सफर ये

यूँ तो भीड़ थी बेशुमार, पर जैसे कोई नही था आस-पास 

थी शीघ्रता सभी को मंजिल तक जाने की, अभी यकीनन

घड़ी थी ये परीक्षा की, उत्तीर्ण होना था जरूरी जिसमें 

ये नतीजा ही तो करता तय आने वाली जिन्दगी की तस्वीर 

बनाता भविष्य की खुशियों और गमों का लेखा-ज़ोखा

पल ये छात्र जीवन के आते हैं जब याद अधेड अवस्था में 

बरबस ही आ जाती है मुस्कान, लेकिन मिलता है सुकून 

निःसंदेह होता है गर्व कोशिशों पे अपनी, देख अपना वर्तमान 


-दीपिका जैन 

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