Ek Chah Hai / एक चाह है (Poetry On Dream)
मुस्कान
लबों की यूँ ही रहे बरकरार, मिलती रहे खुशियाँ बेशुमार
बस
यही तो एक ख्वाहिश है मेरी, माँगती हूँ जो खुदा से लगातार
खौफ़
नहीं गमों का, डरती नहीं आँसुओं से, आते है जो बार-बार
हो
गयी है आदत इनकी, बिन इनके हो जायेगा जीवन निस्सार
है
ख्वाब एक बदलाव का, चाहती हूँ हँसना खुलकर बस एक बार
निकलना
चाहती हूँ छाँव से धूप की ओर, नहीं चाहती मानना हार
बस
यही एक तमन्ना लिए जी रहीं हूँ, जोड़ रही हूँ खुशियों के तार
रुकना
नहीं, थमना नहीं, चलते जाना कह रही हूँ खुद से हर बार
आए
अड़चने अनगिनीत रोकने को, मिले चाहे राहों में काँटे हजार
बस
थाम लूँ दामन खुशियों का एक बार, करूँ मैं उनको प्यार बेशुमार
गर
हो जाए अभिलाषा ये पूरी मेरी तो, यकीनन नहीं दुखों में जाऊँ हार
-दीपिका जैन

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