Kya Kahun Main / क्या कहूँ मैं (Poetry On Eyes)
तेरी इन आँखों की तारीफ़ में क्या कहुँ मैं
अफ़सोस की आते नहीं अल्फ़ाज़ ज़ेहन में मेरे
या ये समझ लो की डूब गया हुआ इनके भँवर में
लगता हैं कुछ ऐसा निकल ना पाउँगा इनसे कभी
बस एक बार बता दे की ऐसी क्या हो गयी थी ख़ता
जो तेरी निगाहों की ज़ंजीरों ने जकड़ लिया हैं मुझे
शिकायत नहीं सवाल हैं ये मेरा तुझसे एक मासूम सा
यूँ तो मिल रहा हैं सुकून इस क़ैद में, फिर भी चाहता हूँ ज़वाब
क्यों कर रही बेवज़ह जुल्म तेरी ये निगाहें मुझ पर
तेरी इन आँखों की तारीफ़ में क्या कहुँ मैं
-दीपिका जैन
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