Mukammal Ho Jaye Khwaab Mera / मुकम्मल हो जाए ख्वाब मेरा (Poetry On Dream)
बीती रात बेहद ही खूबसूरत एक ख़्वाब मैंने हैं देखा
मुकम्मल हुई हर आरज़ू उसमे मेरी, नहीं रही कोई
अधूरी
कुछ पलों के लिए ही सही आ गयी लबों पे मुस्कान मेरे
यूँ तो वाकिफ़ हूँ इस बात से, ज़रा भी नहीं अन्जान में
मुमकिन नहीं हर एक ख़्वाब का हक़ीक़त में
तब्दील होना
फिर भी हैं चाह दिल से, हो जाए ये ख़्वाब मुकम्मल मेरा
समझता रहा जो ज़माना नादाँ मुझे, और करता उपेक्षित
मिल जाये जवाब उसे मेरी ओर से, हो जाए ग़र ख़्वाब ये पूरा
बीती रात बेहद ही खूबसूरत एक ख़्वाब मैंने हैं देखा
मुकम्मल हुई हर आरज़ू उसमे मेरी, नहीं रही कोई
अधूरी
-दीपिका जैन

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