Aaya Nahi Zehan Mein Kuch / आया नहीं ज़ेहन में कुछ ( Poetry On Nature)
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Aaya
Nahi Zehan Mein Kuch / आया नहीं ज़ेहन में कुछ ( Poetry
On Nature)
प्रकृति की ख़ूबसूरती शब्दों में ढ़ालने की ख़्वाहिश लिए
उठाई जब मैंने कलम और दवात,आया नहीं ज़ेहन में कुछ
क्या लिखूँ, क्या ना लिखूँ इसी
कश्मकश में हो गयी शाम
आलम ये शाम का लगा रहा था कायनात में चार चाँद
चल रहीं थी हवायें ठंडी-ठंडी, बेहद ही सुहावना था मौसम
बढ़ने लगी थी ख़ूबसूरती आसमां की चाँद और सितारों से
प्रकृति की ख़ूबसूरती शब्दों में ढ़ालने की ख़्वाहिश लिए
उठाई जब मैंने कलम और दवात,आया नहीं ज़ेहन में कुछ
देख इतना अद्भुत द्रश्य, हुआ नहीं मुझे यकीं तकदीर पे अपनी
सोचने लगी ये हक़ीक़त हैं या ख़्वाब, अविश्वसनीय थी तस्वीर ये
निकाल दिया फिर ख्याल मैंने ज़ेहन से अपने कुछ लिखने का
क्योकि नहीं था मुमकिन इस ख़ूबसूरती को ढ़ालना शब्दों में
प्रकृति की ख़ूबसूरती शब्दों में ढ़ालने की ख़्वाहिश लिए
उठाई जब मैंने कलम और दवात,आया नहीं ज़ेहन में कुछ
-दीपिका जैन

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