Ghar Ki Raunak / घर की रौनक (Poetry On Childhood)
Ghar
Ki Raunak / घर की रौनक (Poetry On Childhood)
बच्चों के नन्हे-नन्हे क़दमों की आहट मन प्रसन्न कर देती हैं
इनकी मीठी-मीठी बातें हमें मुस्कुराने पर मज़बूर कर देती हैं
यूँ तो इनकी बातें समझ नहीं पाते हम, फिर भी अच्छी लगती हैं
तुतलाती-सी इनकी बोली हर पल सुनने की ख़्वाहिश रहती हैं
लगता हैं मन सबका इनकी नादानियों से, होते हैं ये रौनक घर की
फूलों से मासूम होते हैं ये बच्चे, खुशबू से अपनी महकाते घर आँगन हैं
किलकारियों से अपनी हमारे आँसुओं को भी मुस्कान में बदल देते हैं
एक पल को भी नज़र ना आये अगर तो बैचेन ये मन हो जाता हैं
बच्चों के नन्हे-नन्हे
क़दमों की आहट मन प्रसन्न कर देती हैं
इनकी मीठी-मीठी बातें हमें मुस्कुराने पर मज़बूर कर देती हैं
-दीपिका जैन

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