Nazm Kudrat Pe / नज़्म कुदरत पे (Poetry On Nature)
Nazm Kudrat Pe / नज़्म कुदरत पे (Poetry On
Nature)
कुदरत की खूबसूरती देख एक नज्म याद आ गयी
मुस्काते हुए उतारने लगी जब शब्दों
को कागज़ पे
तो ना जाने क्यों हवा का एक झोंका वहाँ आ गया
ले गया वो अधूरी नज़्म कुछ यूँ उड़ाकर
संग अपने
पढ़वाना चाहता हो जैसे पूरी कायनात को
जल्द ही
यक़ीनन ख़फ़ा नहीं थी मैं उसकी इन हरकतों से
पर पूछना चाहती थी ज़ेहन में आए सवाल
हज़ार
पर पूछ ना सकी प्रकृति की असीम सुंदरता का राज़
और खो गयी हसीन वादियों में, कुछ ऐसा था इसका प्यार
कुदरत की खूबसूरती देख एक नज्म याद आ गयी
-दीपिका जैन

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें