Mausam Ne Li Angdaai / मौसम ने ली अंगड़ाई (Poetry On Winter)

 Mausam Ne Li Angdaai / मौसम ने ली अंगड़ाई (Poetry On Winter)  मौसम ने ली अंगड़ाई, और चलने लगी सर्द हवाएँ  सूरज की तपिश भी अब बदन को हमारे हैं भाए  लगने लगे हैं अच्छे अब कम्बल, शॉल और रजाईयाँ  आई ऋतु नए फैशन के स्वेटर, कोट, ख़रीदने की  करे बात खाने की तो बेशुमार हैं व्यंजन हमको लुभाए  गज़क, रेवड़ी,चिक्की, लड्डू, मक्का, बाज़रा हम हैं खाए  सूरज की तपिश भी अब बदन को हमारे हैं भाए  सांझ ढ़ले बढ़ता जाता कहर शिशिर का हम काँप जाए  ठिठुरती इस सर्दी में बार-बार आग तपाना चाहे  बैठ सामने इस अनल के गर्म-गर्म चाय हमको भाए  उठा लो लुफ्त इन दिनों का, कहीं ये गुजर ना जाए  सूरज की तपिश भी अब बदन को हमारे हैं भाए   -दीपिका जैन


Mausam Ne Li Angdaai / मौसम ने ली अंगड़ाई (Poetry On Winter)

 

मौसम ने ली अंगड़ाई, और चलने लगी सर्द हवाएँ 

सूरज की तपिश भी अब बदन को हमारे हैं भाए 

लगने लगे हैं अच्छे अब कम्बल, शॉल और रजाईयाँ 

आई ऋतु नए फैशन के स्वेटर, कोट, ख़रीदने की 

करे बात खाने की तो बेशुमार हैं व्यंजन हमको लुभाए 

गज़क, रेवड़ी,चिक्की, लड्डू, मक्का, बाज़रा हम हैं खाए 

सूरज की तपिश भी अब बदन को हमारे हैं भाए 

सांझ ढ़ले बढ़ता जाता कहर शिशिर का हम काँप जाए 

ठिठुरती इस सर्दी में बार-बार आग तपाना चाहे 

बैठ सामने इस अनल के गर्म-गर्म चाय हमको भाए 

उठा लो लुफ्त इन दिनों का, कहीं ये गुजर ना जाए 

सूरज की तपिश भी अब बदन को हमारे हैं भाए 

 

-दीपिका जैन

टिप्पणियाँ